दिल्ली आबकारी नीति केस: कोर्ट ने कहा “केस ही नहीं बनता”, सभी 23 आरोपी डिस्चार्ज
दिल्ली आबकारी नीति मामले में राउज एवेन्यू की विशेष सीबीआई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत 23 आरोपियों को डिस्चार्ज किया। कोर्ट ने कहा—आरोप तय करने लायक भी सामग्री नहीं।
क्या है पूरा मामला?
दिल्ली की पूर्व आबकारी नीति से जुड़े मामले में बड़ा मोड़ आया है। 176 दिन और 530 दिन जेल में रहे। लेकिन अब राउज एवेन्यू स्थित विशेष सीबीआई कोर्ट ने कहा कि आरोप तय करने के लिए “गंभीर संदेह” तक बनाने वाली कानूनी सामग्री उपलब्ध नहीं है।
विशेष जज जितेंद्र सिंह ने 598 पेज के आदेश में सभी 23 आरोपियों को डिस्चार्ज (आरोप तय होने से पहले आरोपमुक्त) कर दिया।
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने अपने आदेश में कई अहम बातें कही:
- अभियोजन की थ्योरी न्यायिक कसौटी पर खरी नहीं उतरती।
- व्यापक साजिश के समर्थन में कोई कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत नहीं।
- जांच “पूर्वनियोजित और कोरियोग्राफ्ड” प्रतीत होती है।
- बिना ठोस सबूत के किसी लोकसेवक को आरोपी बनाना न्याय का दुरुपयोग है।
- जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जरूरत बताई गई।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई नीति वैध रूप से बनाई और लागू की गई है, तो उससे लाभ कमाने वाले निजी व्यक्तियों को सिर्फ राजनीतिक असहमति के आधार पर आपराधिक मुकदमे में नहीं घसीटा जा सकता।
सीबीआई और ईडी की प्रतिक्रिया
फैसले के कुछ घंटे बाद ही (CBI) ने हाई कोर्ट में आदेश को चुनौती दे दी।
वहीं (ED) ने कहा कि उसका मामला अलग साक्ष्यों और जांच पर आधारित है।
केजरीवाल की प्रतिक्रिया
फैसले के बाद Arvind Kejriwal मीडिया के सामने भावुक हो गए। उन्होंने इसे “सबसे बड़ा सियासी षड्यंत्र” बताया और कहा:
“अगर भाजपा में हिम्मत है तो दिल्ली में दोबारा चुनाव कराए।”
राजनीतिक असर क्या होगा?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार:
- यह फैसला आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए बड़ी राहत है।
- पंजाब और गुजरात में पार्टी की रणनीति पर असर पड़ सकता है।
- विपक्ष एजेंसियों के कथित दुरुपयोग के मुद्दे पर और आक्रामक हो सकता है।
- अगर हाई कोर्ट इस फैसले पर रोक नहीं लगाता, तो जांच एजेंसियों की साख पर सवाल उठ सकते हैं।
पहले भी ऐसा हुआ है
2008 के 2G स्पेक्ट्रम केस में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री पर बड़े आरोप लगे थे। 2017 में विशेष कोर्ट ने उन्हें सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था।
यह मामला भी दिखाता है कि बड़े राजनीतिक आरोप अदालत में साबित होना अलग बात है।
निष्कर्ष
दिल्ली आबकारी नीति केस में आया यह फैसला भारतीय राजनीति में बड़ा मोड़ माना जा रहा है। अदालत ने साफ कहा कि बिना ठोस और स्वीकार्य सबूत के किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता।
अब सबकी नजर हाई कोर्ट पर है कि वह इस फैसले पर क्या रुख अपनाता है।
